कालीबंगा (Kalibanga)
उपनाम: निर्धन सभ्यता / दीनहीन बस्ती
विशेषताएँ:
नगरीय सभ्यता
कांस्ययुगीन सभ्यता
कालीबंगा सिंधी भाषा का शब्द है: शाब्दिक अर्थ काली चूड़ियाँ है।
प्राचीन दृषद्वती और सरस्वती नदी घाटी (वर्तमान घग्घर नदी) के किनारे यह सभ्यता विकसित हुई है।
कार्बन डेटिंग पद्धति से इसका समय 2350 ई. पूर्व से 1750 ई. पूर्व माना गया है।
कालीबंगा में सभ्यता स्थल होने की सर्वप्रथम प्रमाणिक जानकारी एल.पी.तैस्सीतोरी ने दी थी।
इसकी सर्वप्रथम खोज अमलानंद घोष ने 1952 ई. में की।
यह भारत का दूसरा पुरातात्विक स्थल है जिसकी खोज स्वतंत्रता के बाद की गई है। (प्रथम- रोपड़)
यहाँ पर उत्खनन का कार्य बी.वी. लाल (ब्रजवासी लाल) व बी. के. थापर (बालकृष्ण थापर) ने 1961-1962 ई. में करवाया।
इसे हड़प्पा सभ्यता से भी प्राचीन माना गया है। यह सभ्यता आज से 6,000 वर्ष से भी प्राचीन मानी जाती है।
कालीबंगा से प्राप्त पुरातात्विक साक्ष्य और विशेषताएँ:
दो टीले: खुदाई में दो टीले मिले हैं
पश्चिमी टीला: ऊँचा और छोटा, इसमें दुर्गनुमा नगर बसा था
दूसरा टीला: कम ऊँचा और बड़ा, इसमें बिना दुर्ग का नगर बसा था
दोनों बस्तियों को अलग-अलग सुरक्षात्मक दीवार (दोहरा परकोटा) से सुरक्षित किया गया था
सभ्यता के 5 स्तर: कालीबंगा के उत्खनन में इस सभ्यता के 5 स्तर सामने आए हैं
प्राक् हड़प्पा सभ्यता: पहले दो स्तर हड़प्पा सभ्यता से भी प्राचीन हैं (2400 ई. पूर्व व उससे पहले)
हड़प्पाकालीन सभ्यता: तीसरे, चौथे व पाँचवें स्तर की सामग्री हड़प्पा सभ्यता के समकालीन है
कालीबंगा सभ्यता का विभाजन (उत्खनन से प्राप्त सामग्री के आधार पर)
प्राक् हड़प्पा सभ्यता:
छोटे टीले के सबसे नीचे के दो स्तरों से प्राप्त अवशेष
2400 ई. पूर्व व उससे पहले के
हड़प्पाकालीन सभ्यता
दोनों टीलों के ऊपरी तीन स्तरों में इसके साक्ष्य मिले हैं
प्राक् हड़प्पाकालीन और हड़प्पाकालीन बस्तियों का संबंध
प्राकृतिक आपदा (संभवतः भूकंप) के कारण लगभग 2400 ई.पू. में प्राक् हड़प्पाकालीन बस्ती का अंत हुआ।
कई वर्षों की वीरानी के बाद, लगभग 2350 ई.पू. में सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों ने इसी स्थान पर अपनी बस्ती बसाई।
कालीबंगा की नगर योजना और निर्माण
सुव्यवस्थित नगर: समकोण पर काटती सड़कें
मकानों के दरवाज़े: मुख्य सड़क की ओर न खुलकर, पीछे की गलियों में खुलते थे।
अलंकृत फर्श: फर्श में अलंकृत और सजावटी ईंटों का प्रयोग।
पक्की ईंटों के निर्माण: नालियाँ, स्नानागार, और कुएँ पक्की ईंटों से बने थे।
मकान निर्माण: कच्ची ईंटों से बने मकान, जिन्हें धूप में सुखाकर पक्का किया जाता था (ईंटों का आकार 30x15x7.5 सेमी)।
नगर निर्माण: सुनियोजित नक्शे के आधार पर।
भवनों की छत: लकड़ी की बल्लियों पर मिट्टी से निर्मित।
विश्व का पहला उदाहरण: लकड़ी की नाली के अवशेष यहाँ से मिले हैं।
भवन निर्माण और कृषि:
मकान निर्माण: कच्ची ईंटों से बने मकान, जिन्हें धूप में सुखाकर पक्का किया जाता था (ईंटों का आकार 30x15x7.5 सेमी)।
नगर निर्माण: सुनियोजित नक्शे के आधार पर।
भवनों की छत: लकड़ी की बल्लियों पर मिट्टी से निर्मित।
विश्व का पहला उदाहरण: लकड़ी की नाली के अवशेष यहाँ से मिले हैं।
भूकंप के साक्ष्य: यहाँ के मकानों में दरारें पड़ी मिली हैं जिन्हें विश्व में सर्वप्रथम भूकंप के साक्ष्य माना गया है।
चूल्हे: यहाँ के चूल्हे वर्तमान तंदूर के समान हैं।
परकोटे के बाहर कृषि: हल से समकोण पर जुते हुए खेतों के साक्ष्य मिले हैं। ऐसा अनुमान किया जाता है कि लोग एक ही खेत में दो फसलें उगाते थे।
फसलें: गेहूँ और जौ की फसलों के प्रमाण मिले हैं। इसके अलावा कपास की खेती के सर्वप्रथम साक्ष्य मिले हैं।
पशुपालन और अंतिम संस्कार:
पशुपालन: यहाँ से ऊँट की अस्थियाँ मिली हैं। प्रमुख पालतू पशु कुत्ता था।
अंतिम संस्कार:
बस्ती के दक्षिण में एक कब्रिस्तान भी मिला है।
यहाँ से तीन प्रकार की समाधियाँ (शवाधान पद्धतियाँ) मिली हैं।
एक प्रकार में अंडाकार खड्डे में उत्तर की ओर सिर रखकर।
दूसरे प्रकार में शव की टाँगे समेटकर गाड़ा जाता था।
तीसरे प्रकार में शव के साथ बर्तन और सोने व मणि के दानों की माला से विभूषित कर गाड़ा जाता था।
यहाँ के लोग शव गाड़ते थे। सिर उत्तर में, पैर दक्षिण में व मुँह ऊपर की तरफ होता था। जिसे अंडाकार कब्र / चिरायु कब्र नाम दिया गया है।
अंतिम संस्कार और धार्मिक प्रथाएं:
युगल समाधि: एक युगल को एक साथ दफनाने की प्रथा का प्रमाण मिला है।
मस्तिष्क शोध के संकेत: एक बालक की खोपड़ी में छह छेद मिले हैं, जिसे मस्तिष्क संबंधी बीमारी के इलाज के प्रयास के रूप में देखा जाता है।
हवन कुंड: 7 हवन कुंडों की पंक्ति मिली है, जो यज्ञ और संभवतः बलि प्रथा के प्रचलन का संकेत देती है।
मंदिरों का अभाव: किसी भी प्रकार के मंदिर के अवशेष नहीं मिले हैं, लेकिन स्वास्तिक चिन्ह की उपस्थिति धार्मिक विश्वासों की ओर इशारा करती है।
कला और शिल्प:
मृदभांड: लाल और गुलाबी रंग के चाक निर्मित मृदभांड, सादा तश्तरियाँ, टोंटीदार संकरे मुंह के घड़े, छोटे-बड़े मटके आदि।
अन्य कलाकृतियाँ: पकी मिट्टी से निर्मित त्रिभुजाकार केक, खिलौना गाड़ी, पहिए, बैल की खंडित मूर्ति, हड्डी की सलाईयाँ, पत्थर के बने सिलबट्टे, मिट्टी की गेंद, तांबे का परशु (कुल्हाड़ी), तोल के पत्थर के बाट, गाय के मुख वाले प्याले, तांबे के बैल, कांसे के दर्पण, हाथीदांत का कंघा, कांच की मणियाँ आदि।
मृदभांड की विशेषता: पतले, हल्के, लाल रंग के बर्तन जिन पर काली व सफेद रंग की रेखाएँ हैं। सुंदरता और सुडौलता का अभाव है।
आभूषण और भंडारण: मिट्टी, तांबे और कांसे की चूड़ियाँ और गहने व बर्तन रखने के प्रमाण मिले हैं।
सामाजिक संरचना:
मोहरें: तांबा, सेलखड़ी और मिट्टी की मोहरें मिली हैं। एक मोहर पर महिला “कुमारी देवी” और दूसरी तरफ चीते/व्याघ्र का चित्र अंकित है, जिससे मातृसत्तात्मक समाज होने का अनुमान लगाया जाता है।
विविध:
बेलनाकार मोहरें: कालीबंगा से बेलनाकार मोहरें भी मिली हैं जो मेसोपोटामिया सभ्यता से संबंध दर्शाती हैं।
लिपि: यहाँ की लिपि दायें से बायें लिखी जाती है, जिसे कीलाक्षर लिपि/बुस्टोफेदोन लिपि कहा जाता है। यह लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है।
डॉ. दशरथ शर्मा का कथन: डॉ. दशरथ शर्मा ने कालीबंगा को “सिंधु घाटी सभ्यता की तीसरी राजधानी” कहा है।
कालीबंगा संग्रहालय: कालीबंगा संग्रहालय की स्थापना 1985-86 में की गई थी।
आहड़ सभ्यता: अध्ययन नोट्स
स्थान:
उदयपुर शहर के निकट, आयड़ नदी के किनारे स्थित
प्राचीन नाम:
ताम्रवती नगरी
ताँबावती
आघाटपुर
आघाट दुर्ग
स्थानीय नाम:
धूलकोट (आयड़/आहड़ नदी के किनारे स्थित ऊँचे टीले का स्थानीय नाम)
अन्य नाम:
बनास संस्कृति (एच.डी. सांकलिया द्वारा दिया गया)
ग्रामीण संस्कृति की सभ्यता
मृतकों का टीला
काल:
4,000 वर्ष पुरानी (1900-1200 ई. पूर्व) ताम्रपाषाण सभ्यता
उत्खनन:
सर्वाधिक उत्खनन कार्य एच.डी. सांकलिया द्वारा करवाया गया
प्रमुख बिंदु:
यह सभ्यता अपने तांबे के उपकरणों और आभूषणों के लिए प्रसिद्ध थी, इसलिए इसे ‘ताम्रवती नगरी’ भी कहा जाता है।
‘बनास संस्कृति’ नाम इसे आयड़ नदी की सहायक नदी बनास के कारण दिया गया है।
यहाँ बड़ी संख्या में कब्रें मिली हैं, जिसके कारण इसे ‘मृतकों का टीला’ भी कहा जाता है।
यह सभ्यता ताम्रपाषाण युग की है, जो पाषाण युग और कांस्य युग के बीच के संक्रमण काल को दर्शाती है।
अतिरिक्त नोट:
आहड़ सभ्यता के लोग मुख्यतः कृषि और पशुपालन पर निर्भर थे।
यहाँ से मिले मृदभांड और अन्य कलाकृतियाँ उनके सांस्कृतिक और कलात्मक विकास को दर्शाते हैं।
खोज एवं उत्खनन:
सर्वप्रथम खोज: अक्षय कीर्ति व्यास (1953 ई.) ने की। बाद में रतनचन्द्र अग्रवाल (1956 ई.) ने भी खोज की।
उत्खनन: वी.एन. मिश्र और एच.डी. सांकलिया (1961 ई.) द्वारा किया गया। राजस्थान सरकार ने विजय कुमार एवं पी.सी. चक्रवर्ती को भी उत्खनन कार्य में नियुक्त किया।
उत्खनन के स्तर:
प्रथम स्तर: स्फटिक पत्थरों की अधिकता
द्वितीय स्तर: तांबे, कांसे और लोहे के उपकरण
तृतीय स्तर: मृदभांड
भवन निर्माण:
नींव: काला पत्थर (शिष्ट पत्थर) से भरी जाती थी, जो आहड़ के पास बहुतायत में उपलब्ध है।
दीवारें: धूप में सुखाई गई ईंटों और पत्थरों से निर्मित।
सामने की दीवार: सफाई से चिनी जाती थी।
आकार: अधिकांश मकान आयताकार और बड़े आकार के थे।
कमरों का विभाजन: बड़े कमरों को बाँस की पड़दी (चटाई) लगाकर और मिट्टी चढ़ाकर छोटे कमरों में विभाजित किया जाता था।
छत: बाँस बिछाकर, उस पर मिट्टी का लेप (केलू) किया जाता था।
फर्श: चिकनी मिट्टी में पीली मिट्टी मिलाकर बनाई जाती थी।
पानी निकासी: वैज्ञानिक पद्धति (चक्रकूप पद्धति) का उपयोग होता था जिसमें 15-20 फुट गहरे गड्ढे में मिट्टी के घड़ों को रखकर “शोषण पात्र” बनाया जाता था।
कृषि और खानपान:
कृषि: लोग कृषि करते थे और अन्न पकाकर खाते थे।
चावल: उच्च कोटि का चावल, आधुनिक देहरादून के लंबे चावलों के समान।
चूल्हे: मकानों में 2, 3 या 6 चूल्हे मिले हैं, जो संयुक्त परिवार की ओर संकेत करते हैं।
कला और शिल्प:
बनासियन बुल टेराकोटा: यहाँ से बैल की अनूठी मिट्टी की मूर्ति मिली है, जिसे पुराविदों ने “बनासियन बुल टेराकोटा” नाम दिया है।
तांबे के उपकरण और आभूषण: तांबे की मुद्रिकाएँ, चूड़ियाँ, चाकू, कुल्हाड़ी, बर्तन और उपकरण मिले हैं, जो इस सभ्यता के लोगों के धातु कर्म में कौशल को दर्शाते हैं।
मणियाँ और धूपदानियाँ: विभिन्न प्रकार की 26 मणियाँ और धूपदानियाँ मिली हैं, जो उनकी धार्मिक प्रथाओं और सौंदर्य बोध को दर्शाती हैं।
अंतिम संस्कार और व्यापार:
शवाधान: शव को कपड़ों और आभूषणों के साथ दफनाया जाता था, जो मृत्यु के बाद भी जीवन की अवधारणा में उनके विश्वास को दर्शाता है। शव का सिर उत्तर दिशा की ओर रखा जाता था।
यूनानी मुद्राएँ और मोहरें: 6 यूनानी मुद्राएँ और 3 मोहरें मिली हैं, जिनमें से एक पर त्रिशूल और दूसरी पर यूनानी देवता अपोलो का चित्र है। यह आहड़ सभ्यता के यूनानी सभ्यता के साथ व्यापारिक संबंधों को दर्शाता है।
अन्य महत्वपूर्ण बिंदु:
तांबे का गलाना: तांबे को गलाने की भट्टी मिली है, जो धातु विज्ञान में उनकी प्रगति को दर्शाती है।
चांदी से अपरिचित: आहड़ सभ्यता के लोग चांदी से अपरिचित थे।
व्यापार और मुद्रा:
व्यापारिक संबंध: यूनानी मुद्राओं की उपस्थिति से यह संकेत मिलता है कि आहड़ का व्यापार विदेशों तक फैला हुआ था। ये मुद्राएँ दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व की हैं और इन पर यूनानी भाषा में लेख लिखे हैं।
अन्न भंडारण और मृदभांड:
अन्न भंडारण: बड़े मृदभांड मिले हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में “गोरे” और “कोठे” कहा जाता है। यह अनाज भंडारण की उन्नत प्रणाली को दर्शाता है।
मृदभांड: आहड़ में मिट्टी के बर्तन (मृदभांड) बहुतायत में मिले हैं। लाल-काले और भूरे रंग के मृदभांड प्रमुख हैं। यह आहड़ को “लाल-काले मृदभांड संस्कृति” का प्रमुख केंद्र बनाता है।
अन्य मृदभांड: बाट और माप के उपकरण भी मिट्टी से बने मिले हैं।
उद्योग और कला:
छपाई: छपाई के ठप्पे मिले हैं, जो रंगाई और छपाई उद्योग के विकास की ओर इशारा करते हैं।
अन्य उपकरण: आटा पीसने की चक्की भी मिली है।
मूर्ति कला: नारी की एक खंडित मूर्ति मिली है, जो कमर से नीचे लहंगा पहने हुए है।
जल पात्र: बिना हत्थे का एक जल पात्र मिला है, जिसके समान पात्र ईरान और बलूचिस्तान में भी मिले हैं।
लोहे का प्रयोग और कालखंड विभाजन:
लोहे का प्रवेश: आहड़ सभ्यता में लोहे का उपयोग शुरू हो चुका था। यहाँ से लोहे के 79 उपकरण, जैसे कुल्हाड़ी, चाकू और अंगूठियाँ आदि, मिले हैं।
कालखंड विभाजन:
कालखंड प्रथम: आहड़ सभ्यता के नीचे के स्तर को “कालखंड प्रथम” कहा जाता है। यह ताम्रयुगीन सभ्यता का द्योतक है।
कालखंड द्वितीय: ऊपर के स्तर को “कालखंड द्वितीय” कहा जाता है, जिसे आहड़ संस्कृति के नाम से भी जाना जाता है।
कालखंड एवं लोह युग:
आहड़ सभ्यता में दो कालखंड देखे गए हैं:
कालखंड प्रथम: ताम्रयुगीन सभ्यता
कालखंड द्वितीय: आहड़ संस्कृति, जहाँ तांबे के साथ-साथ लोहे के उपकरणों का भी प्रयोग होता था।
यह दर्शाता है कि आहड़ सभ्यता के लोग तकनीकी रूप से उन्नत थे और समय के साथ उन्होंने लोहे के उपयोग को अपनाया।
सभ्यता का विस्तार और पुनर्वास:
ऐसा प्रतीत होता है कि किसी प्राकृतिक प्रकोप के कारण आहड़ सभ्यता का विनाश हुआ।
इसके बाद, लोग उत्तर-पूर्व और दक्षिण-पूर्व की ओर बढ़े और गिलूंड (राजसमंद) व भगवानपुरा जैसे नए स्थानों पर बस गए।
उत्खनित स्थल और तांबे की खदानें:
आहड़ के उत्खनित स्थल को “मृतकों का टीला” या “महासतियों का टीला” भी कहा जाता है।
यहाँ एक 40 फीट गहरे गड्ढे से इस सभ्यता के 8 बार बसने और 8 बार उजड़ने के प्रमाण मिले हैं। यह इस क्षेत्र में बार-बार प्राकृतिक आपदाओं या अन्य कारणों से होने वाले विनाश और पुनर्निर्माण की ओर संकेत करता है।
आहड़ क्षेत्र में 40 तांबे की खदानें थीं, जिनसे तांबा निकाला जाता था। यह आहड़ सभ्यता के लोगों के लिए तांबे के एक महत्वपूर्ण स्रोत होने का संकेत देता है और उनकी धातु संबंधी गतिविधियों में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है।
ताम्र पाषाण काल और लौह युग:
आहड़ और गणेश्वर सभ्यताएँ मुख्यतः ताम्र पाषाण काल की थीं, लेकिन उनके ऊपरी स्तर पर लौह युग के अवशेष भी प्राप्त होते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि इन सभ्यताओं ने समय के साथ तकनीकी विकास किया और लोहे के उपयोग को अपनाया।
गणेश्वर सभ्यता: अध्ययन नोट्स
स्थान एवं खोज:
सीकर जिले के नीमकाथाना में कांतली नदी के किनारे स्थित
सर्वप्रथम खोज: रतनचन्द्र अग्रवाल (1972 ई.)
उत्खनन: रतनचन्द्र अग्रवाल व विजय कुमार (1977 ई.)
2800 ई. पूर्व की सभ्यता के अवशेष मिले हैं
उपनाम:
भारत की ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी
ताम्रयुगीन सभ्यताओं में प्राचीनतम
ताम्र संचयी संस्कृति
महत्व:
डॉ. विजय कुमार के अनुसार रेडियो कार्बन पद्धति से यह ताम्रयुगीन सभ्यताओं में प्राचीनतम है
इसे “भारतीय ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी” कहा जाता है
यह संस्कृति पूर्वी राजस्थान एवं गंगा घाटी के क्षेत्र में पल्लवित हुई
निर्माण एवं विशेषताएँ:
मकान पत्थरों से बनाए जाते थे
उत्खनन के दौरान पत्थर के बांध प्राप्त हुए हैं (एकमात्र सभ्यता स्थल)
तांबे के उपकरण व पात्रों में 99 प्रतिशत तांबा है
तांबे के उपकरण: बाण, मछली पकड़ने के कांटे, कुल्हाड़ी, फरसे, आयुध, उस्तरे के फलक, अंगूठियाँ आदि
दोहरी पेचदार शिरावाली ताम्र पिनों का पश्चिमी तथा मध्य एशिया में निर्यात होता था (अनुमान)
6 प्रकार के मृदभांड प्राप्त हुए हैं जिन्हें कृष्णवर्णी मृदपात्र कहते हैं। ये काले व नीले रंग से सजाए हुए हैं
तांबे की आपूर्ति खेतड़ी (कोहल्ण) की खानों से होती थी
सम्पूर्ण सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा, मोहनजोदड़ो) में तांबे की आपूर्ति गणेश्वर से होती थी
गणेश्वर को “पुरातत्व का पुष्कर” कहा जाता है
बालाथल सभ्यता
स्थान एवं खोज:
उदयपुर (वल्लभनगर तहसील) में बेड़च नदी के किनारे स्थित है।
ताम्रपाषाण युगीन आहड़ संस्कृति से संबंधित सभ्यता है।
इस सभ्यता की खोज 1962-63 में डॉ. वी.एन. मिश्र ने की थी।
उत्खनन: वी.एन. मिश्र (पूना विश्वविद्यालय) ने 1993 में करवाया।
उत्खनन से प्राप्त साक्ष्य:
मिट्टी से बनी सांड की मूर्ति
पत्थर के मनके
पक्की मिट्टी की मूर्तियाँ
पशु आकृतियाँ
तांबे के औजार: कुल्हाड़ी, छैनी, चाकू, उस्तरे, गंडासे, चूलदार बाणों के अग्र भाग
तांबे की मुद्राएँ (जिन पर हाथी व चन्द्रमा की आकृतियाँ हैं)
कर्णफूल, गले के हार के लटकन आदि
11 कमरों के एक दुर्ग के अवशेष
पक्की ईंटों से बने मकान, जिन पर चूने का प्लास्टर किया हुआ है।
लौहे के औज़ार प्रचुर मात्रा में
5 लोहा गलाने की भट्टियों के अवशेष
हाथ से बुने कपड़े का एक टुकड़ा
विशेषताएँ एवं निष्कर्ष:
बालाथल के उत्खनन से प्राप्त मृदभाण्डों, ताँबे के औजारों और मकानों पर सिन्धु घाटी सभ्यता का प्रभाव दिखाई देता है। इससे सिन्धु वासियों से इनका सम्पर्क होने का अनुमान किया जाता है।
यहाँ लौहे के औजार प्रचुर मात्रा में मिले हैं व 5 लोहा गलाने की भट्टियों के अवशेष मिले हैं, जो लोह युग के होने का प्रमाण है।
बैराठ की तरह हाथ से बुने कपड़े का एक टुकड़ा भी मिला है।
बालाथल में 1800 ई.पू. के लगभग ताम्र पाषाणिक सभ्यता तथा 600 ई.पू. के लगभग लौहयुगीन सभ्यता आबाद होने का अनुमान है।
महत्व:
बालाथल सभ्यता आहड़ संस्कृति का एक महत्वपूर्ण स्थल है। यह ताम्र-पाषाण युग से लेकर लौह युग तक के सांस्कृतिक विकास को दर्शाता है।
सिंधु घाटी सभ्यता के साथ इसके संबंध इस क्षेत्र में व्यापक सांस्कृतिक आदान-प्रदान की ओर संकेत करते हैं।
बैराठ सभ्यता (जयपुर) : अध्ययन नोट्स
प्राचीन नाम और काल:
प्राचीन नाम: विराट नगर (मत्स्य प्रदेश की राजधानी)
कालक्रम: 600 ई.पू. से 322 ई.पू. तक
भौगोलिक स्थिति:
बाणगंगा नदी के किनारे स्थित
प्रमुख स्थल: बीजक पहाड़ी, गणेश डूंगरी, भीम डूंगरी, महादेव डूंगरी
खोज एवं उत्खनन:
प्रारंभिक खोज: कैप्टन बर्ट (1837 ई.)
अशोक का शिलालेख: कैप्टन बर्ट को बीजक पहाड़ी से मौर्यकालीन शिलालेख मिला (ब्राह्मी लिपि, प्राकृत भाषा), जो अशोक के बौद्ध धर्म अपनाने का प्रमाण है।
1840 ई.: शिलालेख को कोलकाता संग्रहालय में रखा गया।
1871 ई.: कार्लाइल ने भीम डूंगरी से एक और शिलालेख खोजा।
प्रथम उत्खनन: दयाराम साहनी (1936 ई.) – गोलाकार बौद्ध मंदिर के अवशेष मिले (बाद में बौद्ध विहार के रूप में पहचाना गया)।
पुनः सर्वेक्षण एवं उत्खनन: नीलरत्न बनर्जी व कैलाशनाथ दीक्षित (1962 ई.)
1999 ई.: बीजक पहाड़ी से बौद्ध विहार, स्तूप, बुद्ध की मूर्ति आदि मिले।
अन्य महत्वपूर्ण खोजें:
अशोककालीन गोल मंदिर के अवशेष
बौद्ध मठ, बौद्ध विहार, बौद्ध चैत्य
मिट्टी के बर्तन: थालियाँ, घड़े आदि
पंचमार्क वाले सिक्के
यूनानी शासक मिनांडर के सिक्के
हाथ से बना सूती कपड़ा
त्रिरत्न चिन्ह की आकृतियाँ
निर्माण सामग्री और संरचनाएं:
मिट्टी की ईंटों का प्रयोग: पत्थरों की प्रचुरता के बावजूद, भवनों और मठों का निर्माण मिट्टी की ईंटों से किया गया।
मोहनजोदड़ो से समानता: इन ईंटों की बनावट मोहनजोदड़ो की ईंटों के समान है, जो संभवतः सांस्कृतिक आदान-प्रदान या निर्माण तकनीकों के प्रसार को दर्शाती है।
खंडहरनुमा भवन: उत्खनन में एक 6-7 कमरों वाला खंडहरनुमा भवन मिला है, जिसे पुरातत्ववेत्ता बौद्ध मठ मानते हैं।
पुरातात्विक साक्ष्य:
मिट्टी की कलाकृतियाँ: मिट्टी के बने पूजा पात्र, मटके, लोहे की थालियाँ, घड़े, नाचता हुआ पक्षी, पत्थर की सन्दूकें, लोहे की कीलें आदि मिली हैं।
अलंकृत मृदभांड: मृदभांडों में अलंकृत घड़े जिन पर स्वास्तिक तथा त्रिरत्नचक्र के चिह्न बने हुए हैं। इससे पूर्व आर्यन लोगों की विद्यमानता के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं।
चांदी की मुद्राएँ: हाथ से बने सूती कपड़े में बंधी 36 चाँदी की मुद्राएँ मिली हैं। इनमें से 8 पंचमार्क/आहत सिक्के तथा 28 इंडोग्रीक/हिन्द यूनानी राजाओं के सिक्के हैं। इन 28 मुद्राओं में 16 यूनानी शासक मिनेण्डर की हैं।
ह्वेनसांग/युआन च्वांग (चीनी यात्री) का विवरण:
634 ईस्वी में बैराठ यात्रा: हर्षवर्धन के शासनकाल में ह्वेनसांग बैराठ आया था। उसने अपने यात्रा वृत्तांत में बैराठ के लिए “प्रो-लि-ये-ता-लो” शब्द का प्रयोग किया है।
8 बौद्ध विहार: ह्वेनसांग ने बैराठ में उस समय 8 बौद्ध विहार होने का उल्लेख किया है।
मिहिरकुल द्वारा विनाश: ह्वेनसांग के अनुसार बैराठ के विनाश के लिए हूण शासक मिहिरकुल जिम्मेदार था।
मुगलकालीन साक्ष्य:
अकबर द्वारा टकसाल की स्थापना: बैराठ में अकबर ने एक टकसाल (सिक्के बनाने का कारखाना) खोली थी।
तांबे के सिक्के: इस टकसाल में अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ के शासनकाल में तांबे के सिक्के ढाले जाते थे।